विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने 7 अप्रैल 2026 को अपनी स्थापना के 78 वर्ष पूरे कर लिए हैं। द्वितीय विश्व युद्ध की विभीषिका के बाद जब दुनिया पुनर्निर्माण के दौर से गुजर रही थी तब वैश्विक नेताओं ने महसूस किया कि शांति और सुरक्षा केवल सीमाओं की रक्षा से नहीं बल्कि लोगों के स्वास्थ्य से भी जुड़ी है। 1945 में संयुक्त राष्ट्र के गठन के दौरान ही एक वैश्विक स्वास्थ्य संस्था की आवश्यकता पर चर्चा शुरू हुई। अंततः 7 अप्रैल 1948 को डब्ल्यूएचओ का संविधान लागू हुआ। स्विट्जरलैंड के जिनेवा में मुख्यालय के साथ शुरू हुआ यह संगठन आज दुनिया के 194 देशों में स्वास्थ्य नीतियों और सुरक्षा का प्रहरी बना हुआ है। भारत इस संगठन के संस्थापक सदस्यों में से एक रहा है। डब्ल्यूएचओ का दक्षिण-पूर्वी एशिया का क्षेत्रीय कार्यालय नई दिल्ली में स्थित है, जो इस क्षेत्र की स्वास्थ्य चुनौतियों से लड़ने में भारत की महत्वपूर्ण भागीदारी को दर्शाता है।
डब्ल्यूएचओ के प्रमुख कार्य और उद्देश्य: डब्ल्यूएचओ का कार्य क्षेत्र अत्यंत व्यापक है। इसके मुख्य उद्देश्यों को निम्नलिखित बिंदुओं में समझा जा सकता है:
1. स्वास्थ्य प्रणालियों का सुदृढ़ीकरण: विकासशील और विकसित देशों में स्वास्थ्य सेवाओं के बुनियादी ढांचे को मजबूत करना ताकि गरीब से गरीब व्यक्ति को प्राथमिक चिकित्सा मिल सके।
2. महामारी नियंत्रण और निगरानी: संक्रामक रोगों जैसे एचआईवी, मलेरिया, टीबी और हालिया कोविड-19 जैसी वैश्विक महामारियों की निगरानी करना और उनके प्रसार को रोकने के लिए अंतरराष्ट्रीय मानक तय करना।
3. गैर-संचारी रोगों से लड़ना: आधुनिक जीवनशैली के कारण बढ़ते कैंसर, मधुमेह और हृदय रोगों के प्रति जागरूकता फैलाना।
4. मानक निर्धारण: दवाओं, टीकों और खाद्य सुरक्षा के लिए वैश्विक मानक और दिशानिर्देश तैयार करना ताकि चिकित्सा के नाम पर किसी के स्वास्थ्य से खिलवाड़ न हो।
ऐतिहासिक सफलताएं: चेचक का उन्मूलन और पोलियो पर विजय : डब्ल्यूएचओ की सबसे बड़ी सफलताओं में से एक 'चेचक' का पूर्ण उन्मूलन है। 1980 में संगठन ने दुनिया को चेचक मुक्त घोषित किया, जो चिकित्सा इतिहास की सबसे बड़ी मानवीय जीत मानी जाती है। इसके बाद 'पल्स पोलियो अभियान' के माध्यम से दुनिया के अधिकांश हिस्सों से पोलियो को खत्म किया गया। भारत को 2014 में पोलियो मुक्त घोषित करना डब्ल्यूएचओ और भारत सरकार के सफल समन्वय का एक उत्कृष्ट उदाहरण है।
इसके अतिरिक्त, इबोला वायरस, सार्स और बर्ड फ्लू जैसी खतरनाक बीमारियों को सीमित करने में भी संगठन की भूमिका सराहनीय रही है। वर्तमान में डब्ल्यूएचओ मलेरिया के पहले टीके (‘आरटीएस,एस’) के वितरण पर काम कर रहा है, जो अफ्रीका और एशिया के लाखों बच्चों के लिए जीवनदान साबित होगा।
कोविड-19: एक कठिन परीक्षा और सीख : साल 2020 में आई कोविड-19 महामारी ने डब्ल्यूएचओ की प्रासंगिकता और उसकी सीमाओं दोनों को दुनिया के सामने रखा। एक ओर जहां संगठन ने 'कोवैक्स' पहल के जरिए गरीब देशों तक वैक्सीन पहुंचाने का प्रयास किया, वहीं दूसरी ओर वायरस की उत्पत्ति और सूचनाओं के प्रसार की गति को लेकर कुछ आलोचनाएं भी झेलनी पड़ीं।
हालांकि, इस संकट ने यह सिद्ध कर दिया कि स्वास्थ्य एक सीमाबद्ध मुद्दा नहीं है। यदि दुनिया का एक कोना बीमार है, तो कोई भी देश सुरक्षित नहीं रह सकता। डब्ल्यूएचओ ने 'वन हेल्थ' के विचार को बढ़ावा दिया, जो मनुष्य, पशु और पर्यावरण के स्वास्थ्य को एक सूत्र में पिरोता है।
समकालीन चुनौतियां और 'पॉलीक्राइसिस' : इस विमर्श में उन चुनौतियों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता जो आज डब्ल्यूएचओ के सामने खड़ी हैं:
• जलवायु परिवर्तन और स्वास्थ्य: बढ़ता तापमान नई बीमारियों और जलजनित रोगों को जन्म दे रहा है। डब्ल्यूएचओ के अनुसार जलवायु परिवर्तन स्वास्थ्य के लिए 21वीं सदी का सबसे बड़ा खतरा है।
• एंटी-माइक्रोबियल रेजिस्टेंस: दवाओं के प्रति बढ़ती प्रतिरोधक क्षमता एक 'मूक महामारी' बन रही है। अगर एंटीबायोटिक्स ने काम करना बंद कर दिया, तो मामूली संक्रमण भी जानलेवा हो सकता है।
• मानसिक स्वास्थ्य: वैश्विक स्तर पर अवसाद और चिंता (एनेक्सिटी) के मामले बढ़ रहे हैं। डब्ल्यूएचओ अब 'मानसिक स्वास्थ्य' को भी उतनी ही प्राथमिकता दे रहा है जितनी शारीरिक स्वास्थ्य को।
• फंडिंग और राजनीति: संगठन की निर्भरता सदस्य देशों के योगदान पर है, जिससे कई बार इसकी निर्णय लेने की क्षमता पर राजनीतिक दबाव पड़ता है।
• भ्रामक सूचनाओं से लड़ना: डिजिटल युग में गलत वैज्ञानिक जानकारियों को रोकना और विज्ञान में जनता का विश्वास बहाल करना संगठन की प्राथमिकता बन गई है।
भारत और डब्ल्यूएचओ: एक अटूट साझेदारी : भारत ने डब्ल्यूएचओ के माध्यम से न केवल अपनी स्वास्थ्य समस्याओं का समाधान किया है बल्कि दुनिया की मदद भी की है। 'वैक्सीन मैत्री' के तहत भारत ने करोड़ों टीके अन्य देशों को भेजे। गुजरात के जामनगर में डब्ल्यूएचओ द्वारा 'ग्लोबल सेंटर फॉर ट्रेडिशनल मेडिसिन' (जीसीटीएम) की स्थापना करना इस बात का प्रमाण है कि विश्व अब आयुर्वेद और योग जैसी भारतीय चिकित्सा पद्धतियों को वैज्ञानिक आधार पर स्वीकार कर रहा है।
भारत में डब्ल्यूएचओ की विशेष पहलें (2025-2026) : डब्ल्यूएचओ वर्तमान में भारत सरकार के साथ मिलकर कई बड़े मिशनों पर काम कर रहा है, जिनका प्रभाव सीधा आम नागरिक के स्वास्थ्य पर पड़ रहा है:
• पारंपरिक चिकित्सा का वैश्विक केंद्र (जामनगर): गुजरात के जामनगर में स्थापित डब्ल्यूएचओ ग्लोबल सेंटर फॉर ट्रेडिशनल मेडिसिन (जीसीटीएम) दुनिया का पहला और एकमात्र ऐसा केंद्र है। दिसंबर 2025 में नई दिल्ली में आयोजित द्वितीय डब्ल्यूएचओ वैश्विक पारंपरिक चिकित्सा शिखर सम्मेलन के बाद 2026 में साक्ष्य-आधारित आयुर्वेद और योग को वैश्विक स्वास्थ्य नीतियों में शामिल करने पर जोर दिया जा रहा है।
• टीबी उन्मूलन लक्ष्य 2025-26: भारत ने 2030 के वैश्विक लक्ष्य से पांच साल पहले, यानी 2025 के अंत तक टीबी मुक्त होने का संकल्प लिया था लेकिन इस पर अभी युद्ध स्तर पर कार्य जारी है। डब्ल्यूएचओ का तकनीकी सहायता नेटवर्क वर्तमान में राज्यों में डेटा सत्यापन और 'निक्षय' (Ni-kshay) पोर्टल के माध्यम से मरीजों की निगरानी में मदद कर रही है।
• डिजिटल हेल्थ और एआई: भारत के 'आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन' को डब्ल्यूएचओ वैश्विक स्तर पर एक मॉडल के रूप में देख रहा है। 2026 में “हेल्थ ऑफ इंडिया समिट” जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से ग्रामीण क्षेत्रों में एआई-संचालित स्वास्थ्य सेवाओं और टेलीमेडिसिन को बढ़ावा देने के लिए डब्ल्यूएचओ तकनीकी मार्गदर्शन प्रदान कर रहा है।
• खसरा और रूबेला उन्मूलन: दक्षिण-पूर्व एशिया क्षेत्र के लिए डब्ल्यूएचओ ने 2026 को खसरा और रूबेला के पूर्ण उन्मूलन का नया लक्ष्य वर्ष निर्धारित किया है, जिसमें भारत का टीकाकरण अभियान (मिशन इंद्रधनुष) सबसे बड़ी भूमिका निभा रहा है।
भविष्य की राह और निष्कर्ष : डब्ल्यूएचओ की स्थापना के 75 से अधिक वर्ष पूरे होने के बाद आज आवश्यकता 'समानता' की है। आज भी दुनिया की आधी आबादी को आवश्यक स्वास्थ्य सेवाएं नहीं मिल पा रही हैं। दरअसल, डब्ल्यूएचओ केवल एक संस्था नहीं बल्कि एक वैश्विक आशा है। भविष्य में डिजिटल हेल्थ, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और सटीक चिकित्सा के माध्यम से डब्ल्यूएचओ को अपनी कार्यप्रणाली को और अधिक पारदर्शी और प्रभावी बनाना होगा। जैसा कि डब्ल्यूएचओ के संविधान में लिखा है— "स्वास्थ्य का आनंद लेना हर मनुष्य का मौलिक अधिकार है, चाहे उसकी जाति, धर्म या आर्थिक स्थिति कुछ भी हो।"